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कर्नाटक में बीजेपी के हार छह कारण

1. मजबूत चेहरे का अभाव

कर्नाटक में भाजपा की हार के प्रमुख कारणों में से एक राज्य में एक मजबूत राजनीतिक चेहरे की अनुपस्थिति को देखा जा रहा है। भाजपा ने पूर्व सीएम येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन बसवराज बोम्मई बदलाव और प्रगति के मामले में जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल रहे। इसके अलावा, कांग्रेस के पास उनके प्रमुख लोगों के रूप में डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया जैसे मजबूत चेहरे हैं, जिसने भाजपा को गंभीर नुकसान किया।


2. प्रमुख नेताओं को दरकिनार कर दिया गया

कर्नाटक में बीजेपी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को इस चुनाव के दौरान दरकिनार कर दिया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और पूर्व डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी जैसे अन्य प्रमुख नेताओं को भी भाजपा ने टिकट नहीं दिया था। इसने दोनों नेताओं ने कांग्रेस ज्वाइन कर उसका नेतृत्व किया। भाजपा के तीनों प्रमुख नेता- बीएस येदियुरप्पा, जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी राज्य में प्रमुख लिंगायत समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन नेताओं को पीछे की सीट पर बिठाने से पार्टी को नुकसान हुआ है।


3. लिंगायत समुदाय को नीचा दिखाया गया

बीजेपी ने चुनाव अभियान के दौरान कई वादे किए, विशेष रूप से उन प्रमुख समुदायों से वोट हासिल करने के लिए जो कर्नाटक में उसके वोट शेयर का बहुमत बनाते हैं। लेकिन यह लिंगायत समुदाय से आने वाले अपने मूल वोट बैंक को बनाए रखने में विफल रही और न ही यह दलित, आदिवासी, ओबीसी और वोक्कालिंगा समुदायों के मतदाताओं को अपने पक्ष में कर पाई। इस बीच, कांग्रेस मुसलमानों, दलितों और ओबीसी के वोटों को पार्टी के लिए मजबूती से बनाए रखने में सफल रही है, और लिंगायत समुदाय के वोट बैंक में पैठ बनाने में भी सफल रही है।


4. भ्रष्टाचार के आरोप

कांग्रेस ने अपने भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए शुरू से ही भाजपा के खिलाफ जिस '40 प्रतिशत सरकार' के टैग का इस्तेमाल किया, वह धीरे-धीरे लोकप्रिय हुआ और जल्द ही लोगों की नजरों में आ गया। भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पिछले साल अप्रैल में भाजपा नेता केएस ईश्वरप्पा के मंत्री पद से इस्तीफे ने आग में घी डालने का काम किया। स्टेट कांट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने भी उनके खिलाफ पीएम से शिकायत की थी। इसका असर राज्य में बीजेपी की जीत पर भी काफी हद तक पड़ा।


5. धार्मिक ध्रुवीकरण उल्टा पड़ गया

कांग्रेस द्वारा बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का वादा करने के बाद कर्नाटक में भाजपा नेताओं ने हलाला, हिजाब, अज़ान, साथ ही भगवान हनुमान सहित कई मुद्दों को उठाया। इनमें से अधिकांश मुद्दों में साम्प्रदायिकता थी, लेकिन ये मुद्दे कर्नाटक में भाजपा के पक्ष में काम नहीं कर पाए, हालांकि देश के अन्य हिस्सों पर इसका अधिक प्रभाव पड़ सकता था। बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड, जो अन्य राज्यों में ठीक काम कर सकता था, कर्नाटक में फेल कर गया।


6. सत्ता विरोधी लहर

कर्नाटक में भाजपा की हार का प्रमुख कारण सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला न कर पाना भी रहा है। कर्नाटक के मतदाताओं ने भाजपा के सत्ता में होने के खिलाफ नाराजगी जताई। भाजपाई बड़े पैमाने पर वादा पूरा करने में भी विफल रहे।


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